बासलिंगा के एक हाथ में गुल्लक है जिसमें सिक्के खनकते हैं और दूसरे हाथ में किताब जो उसे सपने देखने की ताकत देती है. मुंबई के माटुंगा में रहने वाले 19 साल के बासलिंगा ने दिन को तीन हिस्सों मे बांट रखा है. सूरज निकलने से चढ़ने तक वह म्यूनिसिपैलिटी के स्कूल में पढ़ता है, दोपहर में रेत-सीमेंट के काम में या फिर किसी गैरेज में पसीना बहाता है और शाम ढलने तक फिर किताबों और ख्वाबों का दामन थाम लेता है.
यूनिसेफ में जारी Rapid Survey Of Children 2013-2014 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 50% टीनएजर्स सेकेंड्री एजुकेशन भी पूरी नहीं कर पाते हैं. वहीं यह भी एक उभरता हुआ फैक्ट है कि इस दौर में टीनएजर्स के बीच 'इकोनॉमिक इंडीपेंडेंस' का नशा सिर चढ़कर बोल रहा है, लेकिन होता अमूमन ये है कि कच्ची उम्र में आत्मनिर्भर बनने की दौड़ में ज्यादातर बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं.
ऐसे में वो बच्चे ज्यादा नायाब बन जाते हैं जो तीन अलग जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखने में सफल हैं जबकि पूरी दुनिया अभी तक सिर्फ वर्क-लाइफ बैलेंस की बात कर रही है.
टीनएज में पैसे कमाने का गुर है फायदेमंद
इन दिनों Linkedin, Indeed जैसे मशहूर जॉब सर्च प्लेटफॉर्म्स ने स्टूडेंट्स में पार्ट-टाइम काम की लोकप्रियता देखते हुए एक अलग सेक्शन भी बना रखा है. Teen Taki नाम की वेबसाइट पर इस समय 38,00 जॉब्स सिर्फ टीनएजर्स के लिए मौजूद हैं.
हालांकि मेहनतकश बासलिंगा के लिए टीनएज में काम में लगने की वजह पॉकेट मनी जमा करना नहीं बल्कि अपनी पढ़ाई और घर के लिए मजबूत सहारा बनना है. "मैं रोज का 300 से 500 रुपये तक आराम से कमा लेता हूं, जबकि महीने में कम से कम 6000 से 7000 रुपये तक की बचत हो जाती है. काम के सिलसिले में कभी कुर्ला तो कभी सानपाड़ा जान पड़ता है. मुझे इंजीनियर बनना है और इंग्लिश फेवरेट सब्जेक्ट है क्योंकि उसमें कहानियां होती हैं. "
बड़े सपने के साथ छोटी बड़ी कई कुर्बानी भी उनके हिस्से में बदी है जिसे वह खुशी से कुबूल करते हैं “घर जरूरी है बाकी शौक बाद में भी पूरा हो सकता है. पैसे से कभी टिफिन बॉक्स, कभी किताब खरीद लेता हूं कभी भाई के इलाज में लगा देता हूं. जरूरत पड़ने पर गुल्लक से भी पैसा निकालना पड़ता है”
वहीं पढ़ाई के लिए खुद अपना सहारा बनने वाले टीनएजर्स की फेहरिस्त में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं.
मोनी मुहम्मद शकील भी ऐसी ही 19 साल की टीनएजर हैं. वो B.Com फर्स्ट इयर की स्टूडेंट होने के साथ ही माटुंगा के एक क्लीनिक में सहायिका हैं और इस जरिए माता पिता को भी सपोर्ट करती हैं.
उनका भी दिन बासलिंगा की तरह ही तीन हिस्सो में बंटा हुआ है "मैं सुबह 7 से 10 कॉलेज जाती हूं फिर आकर यहां काम करती हूं , 3 बजे तक घर वापस चली जाती हूं. महीने का 4000 मिलता है. जिससे काम चल जाता है"
मोनी बैंकिंग लाइन में अपना मुकाम बनाना चाहती है. वह स्नेहा नाम के एक फाउंडेशन के जरिए धारावी की मुश्किलें सुलझाने में भी अपना रोल अदा रही हैं.
पैसे बचाने के सरल तरीकों में जिन्हें हासिल है महारत
ये बच्चे मनी मैनेजमेंट के सबसे सरल उपायों को अपनाने में माहिर हैं. पैसे बचाने के हुनर पर बासलिंगा कहते हैं कि "बाहर कम जाता हूं क्योंकि ऐसे पैसे बचते हैं, मन पर कंट्रोल रहता है. पास में एक गल्ला डिब्बा रखता हूं जिसमें पैसे जमा करता हूं. मैं मानता हूं जिधर सामान सस्ता मिले उधर जाओ. जब हम महंगी चीज नहीं ले पाते तो सस्ती चीज ले लेते हैं खुशी के लिए. होटल की जगह घर में खाना खा लेते हैं."
जबकि पैसे बचाने के बारे में मोनी कहती हैं "जो सब दोस्त कर रहें हैं हम भी वही करे ये जरूरी नहीं हैं. पैसों को ट्रैक करते रहना जरूरी है इससे पता चलता है कि हम कहां खर्च कर रहे हैं."
वो छोटे से पर्स में पैसे जमा करती हैं और पिता के चेहरे पर फैली मायूसी उन्हें ताकत देती है. वो कहती हैं "जीवन में बहुत मुश्किलें आती हैं हमें डरना नहीं चाहिए और जमकर लड़ना चाहिए."
बहरहाल अकाउंट्स उनका पसंदीदा विषय है, बिलिंग करना, पैसे मैनेज करना, अमाउंट बताना उन्हें एक जादुई प्रक्रिया लगती हैं.
फाइनेंशियल इंटेलिजेंस
इमोशनल इंटेलिजेंस के बाद अब फाइनेंशियल इंटेलिजेंस का जमाना आ गया है. जिसका मतलब है पैसे को लेकर सही समझ, सही नजरिया होना. पैसे को सही ढंग से मैनेज करना और खर्च करने की कला को बारीकी से जानना. जाहिर है आप कितने भी इंटेलिजेंट हों या इमोशनल तौर पर भी इंटेलिजेंट हों लेकिन जबतक आपको बटुआ संभालना नहीं आएगा दुनिया आपसे नहीं संभाली जाएगी.