नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) ने सोमवार से अपने नॉन-लिस्टेड शेयरों के ट्रेड का इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सेटलमेंट शुरू कर दिया है. NSE ने शुक्रवार को एक घोषणा में कहा कि सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज इंडिया लिमिटेड (CDSL) को इन ट्रांजैक्शंस की जिम्मेदारी दी गई है. इससे शेयरों को खरीदने और बेचने की प्रक्रिया काफी आसान हो जाएगी.
इससे क्या फायदा होगा?
इस कदम से ट्रेड्स को महीनों के बजाय कुछ दिनों में निपटाया जा सकेगा, क्योंकि अब खरीदारों को ऐसी लेनदेन के लिए एक्सचेंज और मार्केट रेगुलेटर से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी. इससे प्रस्तावित IPO से पहले ज्यादातर अनियमित ग्रे मार्केट में स्टॉक की ट्रेडिंग को बढ़ावा मिल सकता है.
DRChoksey FinServ Pvt. के मैनेजिंग डायरेक्टर देवेन चोकसी का कहना है 'NSE के शेयरों की भारी मांग के बावजूद, ट्रेड्स को पूरा होने में चार से पांच महीने तक लग रहे थे, ये खराबी अब दूर हो जाएगी.'
पिछले पांच वर्षों में छोटे प्रतिद्वंद्वी BSE के शेयरों में करीब 5,000% की तेजी के बीच ग्रे मार्केट में NSE के शेयरों की मांग बढ़ गई है. SEBI ने पिछले साल एक्सचेंज को यह बदलाव करने का निर्देश दिया था. IPO के बारे NSE ने 2016 में पहली बार ऑफर के लिए आवेदन किया था, लेकिन उसकी योजनाएं काफी लंबे वक्त से अटकी पड़ी हैं.
कंपनी को अभी तक रेगुलेटर की मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन पिछले साल, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने NSE को बाजार में अनुचित पहुंच से जुड़े एक पुराने मामले में किसी भी गलती से मुक्त कर दिया, जिससे उसकी लिस्टिंग योजनाओं में एक बड़ी बाधा दूर हो गई है.
अनलिस्टेड शेयर क्या होते हैं
अनलिस्टेड शेयर किसी कंपनी के निजी तौर पर रखे गए शेयर होते हैं, जिनकी कीमत किसी भी सार्वजनिक स्टॉक एक्सचेंज पर उपलब्ध नहीं होती है. इसमें स्टार्टअप या शुरुआती चरण की कंपनियों के शेयर, NSE जैसी बड़ी लेकिन लिस्ट नहीं हुई कंपनियों के शेयर, और वे कंपनियां शामिल होती हैं जो स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट कर दी गई हैं. ये ऐसे शेयर हैं जो स्टॉक मार्केट (जैसे BSE या NSE) पर खरीदे-बेचे नहीं जाते. ये निजी कंपनियों के होते हैं और इनकी कीमत बाजार में खुले तौर पर तय नहीं होती है.