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Budget 2024: विनिवेश लक्ष्य के कितना करीब पहुंचेगी सरकार, अगले साल के लिए और घटेगा लक्ष्य!

केयर-एज के एक प्री-बजट सर्वे में संभावना जाहिर की गई है कि 31 मार्च 2023 तक सरकार 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा विनिवेश नहीं कर पाएगी.
NDTV Profit हिंदीNDTV Profit डेस्क
NDTV Profit हिंदी01:59 PM IST, 30 Jan 2024NDTV Profit हिंदी
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सब्सिडी, फिस्कल डेफिसिट और विनिवेश - भारत सरकार के हर बजट के इन तीन पहलुओं पर देश-दुनिया के अर्थशास्त्रियों और वित्तीय संस्थानों की सबसे ज्यादा नजर रहती है. फिर चाहे वो चुनावी साल में पेश होने वाला अंतरिम बजट ही क्यों न हो. सब्सिडी और फिस्कल डेफिसिट की चर्चा हम पहले कर चुके हैं.

अब बात करते हैं विनिवेश यानी डिसइनवेस्टमेंट या विनिवेश की. अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले तमाम लोगों को इस बात का अंदाजा पहले से है कि सरकार के लिए इस बार भी अपने विनिवेश के निर्धारित लक्ष्य को हासिल कर पाना मुश्किल है.

ऐसे में सबका ध्यान इस बात पर रहेगा कि FY24 में सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य की दिशा में कितना आगे बढ़ पाती है. इसके अलावा ये सवाल भी अहम है कि पिछले तजुर्बे को ध्यान में रखते हुए सरकार अगले वित्त वर्ष के लिए विनिवेश का क्या लक्ष्य निर्धारित करेगी?

कितना है मौजूदा साल का लक्ष्य

1 फरवरी 2023 को पेश पिछले बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए 51,000 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य तय किया था, लेकिन डिपार्टमेंट फॉर इनवेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक केंद्र सरकार अब तक इसमें से केवल 10,051.7 करोड़ रुपये ही जुटा पाई है, जो घोषित लक्ष्य के महज 20% के बराबर है.

केयर-एज के एक प्री-बजट सर्वे में संभावना जाहिर की गई है कि 31 मार्च 2023 तक सरकार 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा विनिवेश नहीं कर पाएगी. यह रकम डिसइनवेस्टमेंट के पहले से तय टारगेट का 29% ही होगी.

अभी अधूरी है विनिवेश की प्रक्रिया

दरअसल, सरकार ने मौजूदा कारोबारी साल के दौरान जिन सरकारी उपक्रमों के विनिवेश की योजना बनाई थी, उनमें से आईडीबीआई बैंक, बीपीसीएल और पवन हंस के विनिवेश के प्रयास अब तक कामयाब नहीं हो सके हैं. इसी तरह शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और CONCOR के डिसइनवेस्टमेंट में भी अब तक सफलता नहीं मिल पाई है.

आने वाले कुछ महीनों के दौरान देश में आम चुनाव होने हैं. ऐसे में इस अधूरे काम को मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान यानी 31 मार्च 2023 तक पूरा कर पाना मुश्किल है. ऐसे में संभावना यही है कि इन संस्थानों के विनिवेश का बाकी बचा काम अब अगले वित्त वर्ष यानी 2024-25 के दौरान पूरा किया जाएगा. ऐसा करना इसलिए भी ठीक होगा, क्योंकि चुनाव बाद बाजार के हालात सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने के लिए ज्यादा अनुकूल हो सकते हैं.

पहले भी मुश्किल रहा है विनिवेश का लक्ष्य हासिल करना

भारत सरकार के लिए विनिवेश का लक्ष्य हासिल करना पहले भी आसान नहीं रहा है. और पिछले कुछ साल कभी कोरोना महामारी, तो कभी ग्लोबल स्लोडाउन की वजह से और भी मुश्किल भरे रहे हैं. इसके अलावा देश में सरकारी कंपनियों के विनिवेश का मसला राजनीतिक तौर पर भी हमेशा से संवेदनशील रहा है.

पिछले कुछ बरसों के आंकड़ों पर नजर डालें तो FY23 के दौरान सरकार ने शुरुआत में विनिवेश का लक्ष्य 65,000 करोड़ रुपये रखा था. जिसे बाद में घटाकर 50,000 करोड़ रुपये कर दिया गया. मगर साल के अंत में डिसइनवेस्टमेंट से सिर्फ 35,294 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके.

इससे पहले FY22 का अनुभव भी काफी कुछ ऐसा ही रहा था. उस साल सरकार ने पहले 1.75 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य निर्धारित किया था, जिसे बाद में घटाकर 78,000 करोड़ रुपये किया गया. लेकिन 31 मार्च 2022 तक सरकार डिसइनवेस्टमेंट के जरिये सिर्फ 13,531 करोड़ रुपये ही जमा कर पाई.

वित्त वर्ष 2024-25 से क्या करें उम्मीद?

पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए उम्मीद की जा रही है कि सरकार अगले वित्त वर्ष यानी FY25 के लिए डिसइनवेस्टमेंट का भारी-भरकम टारगेट रखने से परहेज कर सकती है. केयर-एज के प्री-बजट सर्वे में हिस्सा लेने वाले इंडस्ट्री के 120 प्रतिनिधियों में से ज्यादातर का अनुमान है कि केंद्र सरकार FY25 के लिए विनिवेश का लक्ष्य पिछले वर्षों के मुकाबले कम रख सकती है.

सर्वे में राय जाहिर करने वाले 47% लोगों ने FY25 के दौरान डिसइनवेस्टमेंट टारगेट 40 हजार करोड़ रुपये या उससे भी कम रखे जाने की संभावना जाहिर की है.

20% लोगों ने यह लक्ष्य 40 से 50 हजार करोड़ रुपये और 14% ने 50 से 60 हजार करोड़ रुपये रखे जाने की उम्मीद जताई है. सर्वे में शामिल सिर्फ 9% लोगों को लगता है कि सरकार अगले वित्त वर्ष के दौरान 60 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा विनिवेश करने का लक्ष्य सामने रख सकती है.

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