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1 अरब टन कोयले का सालाना खनन का हमारा लक्ष्य : कोयला सचिव

कोयला सचिव का यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब देश में बिजली की मांग घटी है और हमारे पावर प्लांट्स में कोयले की भरपूर सप्लाई है. सरकार खुद मानती है कि सभी पावर प्लांट्स में इस वक्त करीब 3 हफ्ते की कोयला सप्लाई है
NDTV Profit हिंदीHridayesh Joshi
NDTV Profit हिंदी01:12 PM IST, 07 Sep 2016NDTV Profit हिंदी
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सरकार ने एक बार फिर से ऐलान किया है कि कोयले का उत्पादन बढ़ाने के अपने इरादे से वह पीछे नहीं हटी है. केंद्रीय कोयला सचिव अनिल स्वरूप ने दिल्ली में हो रहे छठे कोयला सम्मेलन में कहा, हमें अखबारों में छपी इस खबर से हैरानी है, जिसमें कहा गया है कि सरकार कोयला उत्पादन के सालाना 1 अरब टन के लक्ष्य से पीछे हट गई है. हम इतने उत्पादन के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध हैं."

कोयला सचिव का यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब देश में बिजली की मांग घटी है और हमारे पावर प्लांट्स में कोयले की भरपूर सप्लाई है. सरकार खुद मानती है कि सभी पावर प्लांट्स में इस वक्त करीब 3 हफ्ते की कोयला सप्लाई है.

"यह सच है कि अभी पावर डिमांड कम है, लेकिन जिस गति से हमें विकास दर बढ़ानी है, यह नहीं कहा जा सकता कि पावर डिमांड कम ही रहेगी और कोयले की मांग नहीं बढ़ेगी. हमें अभी से उसकी तैयारी करनी चाहिए." कोयला सचिव ने पत्रकारों से कहा कि देश में अभी सालाना कोयला उत्पादन करीब 60 करोड़ टन है. सरकार इसे 2020 तक बढ़ाकर 1 अरब टन सालाना करना चाहती है, लेकिन पर्यावरण के लिए आवाज़ उठाने वाली संस्थाएं और जानकार कोयले के उत्पादन के इस लक्ष्य को फिजूल बता रहे हैं.

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरेन्मेंट यानी सीएसई के उप निदेशक चंद्र भूषण ने एनडीटीवी इंडिया से कहा, कोयला भविष्य नहीं है. आने वाले दिनों में ऊर्जा के गैर-पारंपरिक विकल्पों की कीमत घटेगी और कोयले से मिलने वाली बिजली महंगी होगी.

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हम कोयले से तुरंत निजात पा सकते हैं. हम अगले 10 सालों में भी कोयले से निजात नहीं पा सकते. कोयले से पैदा होने वाली बिजली हमारे बेस लोड का काम करती रहेगी लेकिन पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा समेत गैर पारम्परिक स्त्रोतों से मिलने वाली ऊर्जाकार को लेकर सरकार के अपने लक्ष्य काफी महत्वाकांक्षी है. सरकार 2022 तक करीब 2 लाख मेगावॉट बिजली रिन्यूवेबल स्रोतों से बनाना चाहती है तो ऐसे में 1 अरब टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य कोई मतलब नहीं रखता. "

देश में लगाए गए थर्मल पावर प्लांट्स की कुल क्षमता अभी 1,86,000 मेगावॉट है. बिजली उत्पादन के सभी स्थापित संयत्रों की कुल क्षमता 3 लाख मेगावॉट है. हालांकि बिजली की खपत 1,50,000 मेगा वॉट ही है. इसके बावजूद अभी 65,000 मेगावॉट के थर्मल प्लांट और लगाये जा रहे हैं. इसके अलावा करीब 1,70,000 मेगावॉट के थर्मल प्लांट प्रस्तावित हैं.

कोयले के खिलाफ मुहिम चलाती रही संस्था ग्रीनपीस ने कोयला सम्मेलन का विरोध करते हुए दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की. ग्रीनपीस के कैंपेनर सुनील दहिया ने कहा, "कोयला और बिजली मंत्री पीयूष गोयल पहले ही कह चुके हैं कि हमारे पास कोल और पावर सरप्लस हैं. इसलिए सरकार को साफ-सुथरी ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. कोयले के लिए जंगलों को काटना, लोगों को विस्थापित करना और उनकी सेहत से खिलवाड़ ठीक नहीं है."

सवाल सरकार के अपने आंकड़ों से भी उठ रहे हैं. देश में सभी संयंत्रों की बिजली उत्पादन क्षमता करीब 3 लाख मेगावाट है, लेकिन बिजली की मांग इसकी आधी ही है. 2010 में सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ने अनुमान लगाया था कि बिजली की मांग 2022 में करीब 289000 मेगावॉट होगी लेकिन अथॉरिटी का इसी साल का अनुमान घटकर 239000 मेगावॉट हो गया है. यानी 50,000 मेगावाट की कमी.

महत्वपूर्ण यह भी है कि सरकार ने खुद 2022 तक सौर और पवन ऊर्जा जैसे प्रदूषण न करने वाले माध्यमों से 1,75000 मेगावॉट बिजली बनाने का लक्ष्य रखा है. ऐसे में क्या भारत को 1 अरब टन सालाना कोयले के खनन की ज़रूरत होगी.

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लेखकHridayesh Joshi
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