Expensive Air Fares: कोरोना महामारी का बुरा दौर जा चुका है. दुनिया भर के देशों में इंटरनेशनल फ्लाइट्स पर लगीं पाबंदियां खत्म हो चुकी हैं. एयरलाइन इंडस्ट्री तेजी से पटरी पर आ रही हैं. फ्लाइट से सफर करनेवालों की संख्या लगातार बढ़ रही हैं. ग्लोबली, एविएशन इंडस्ट्री कोविड लॉकडाउन से पहले वाली स्थिति में लौट रही है और एयरलाइंस को बेहतर मुनाफे की उम्मीद है. इसके बावजूद फ्लाइट टिकट के रेट्स कम नहीं हो रहे. आगे भी महंगे किराये से राहत की उम्मीद नहीं है. आखिर क्यों?
दिल्ली से लंदन का किराया 24,000-70,000 रुपये है. न्यूयॉर्क का किराया 54,000-1,98,000 रुपये तक है, जबकि दुबई का किराया 12,000-38,000 रुपये तक है. घरेलू उड़ानों में दिल्ली से मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, पटना, चेन्नई जैसे शहरों के लिए फ्लाइट का किराया 4,500 से 7,000 रुपये तक चल रहा है.
एयरलाइंस कंपनी Ryanair के CEO ने इसी महीने ब्लूमबर्ग के एक कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि गर्मी की छुट्टियों के दौरान टिकट और महंगे होने वाले हैं. आने वाले वर्षों में भी इस महंगाई से राहत की उम्मीद नहीं है.
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA की रिपोर्ट के अनुसार, एविएशन इंडस्ट्री, टरबाइन फ्यूल की बढ़ती कॉस्ट और डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू कम होने के चलते चुनौतियों का सामना कर रही है.
DGCA द्वारा हवाई किराए की सीमा को हटाना, एयरपोर्ट्स का प्राइवेटाइजेशन, महंगे जेट फ्यूल और एयर टिकटों की कंपीटीटिव प्राइसिंग कुछ ऐसे कॉमन कारण हैं, जिनकी वजह से कभी-कभी हवाई किराया कई गुना बढ़ जाता है.
एयरलाइंस कंपनियां एक और तर्क देती हैं, PLF यानी पैसेंजर लोड फैक्टर का. PLF से मतलब ये कि किसी फ्लाइट में जितनी सीटें एवलेबल हैं और उनमें से कितनी बुक हुईं. कई बार 30% तक सीटें खाली रह जाती हैं.
ICRA के वाइस प्रेसिडेंट सुप्रियो बनर्जी के अनुसार, प्रॉफिट मार्जिन बढ़ाने के लिए एयरलाइंस कंपनियों को इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी के अनुपात में ही हवाई सफर का किराया भी बढ़ाना होगा.
पिछले साल अगस्त में जब एयरलाइंस कंपनियों ने ज्यादा किराया होने के पीछे पैसेंजर लोड फैक्टर (PLF) का तर्क दिया था, तब इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (ICCI) में एविएशन, टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी एक्सपर्ट कमेटी के प्रेसिडेंट सुभाष गोयल ने कड़ी आपत्ति जताई थी. वे पर्यटन मंत्रालय की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल के मेंबर भी हैं.
तब उनका कहना था कि डोमेस्टिक उड़ानों की हाई डिमांड न होने के चलते कंपनियां कैसे किराये में मनमानी कर सकती हैं. लोगों को हॉलीडे प्लान कैंसल करना पड़ता है. उन्होंने तब सरकार से टिकट प्राइस में हाई कैपिंग को जारी रखने की मांग की थी.
अगस्त में ही नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने डोमेस्टिक फ्लाइट के लिए मिनिमम और मैक्सिमम फेयर कैप (Air Fare Caps) हटा लिया था. 31 अगस्त 2022 से ये व्यवस्था लागू हुई थी, जिसके बाद एयरलाइंस कंपनियों को फेयर (सस्ता या महंगा) तय करने की छूट मिल गई.
फ्लाइट टिकट महंगे होने का मसला केवल भारत में ही नहीं है, बल्कि ये वैश्विक समस्या है. और ज्यादा चिंता की बात इसलिए भी है कि आगे भी लंबे समय तक एयर टिकट की महंगाई से राहत नहीं मिलने वाली है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समझने की कोशिश करते हैं कि ऐसा क्यों कहा जा रहा है.
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोविड काल में कई एयरलाइंस ने अपने विमानों के बेड़े का एक बड़ा हिस्सा डंप कर दिया था. दनियाभर के कमर्शियल फ्लीट का दो-तिहाई हिस्सा यानी करीब 16 हजार से ज्यादा विमान किनारे लगे हुए थे. इनमें से एक बड़ा हिस्सा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रेगिस्तान में रखा हुआ था, जिनकी तस्वीरें भी खूब वायरल हुई थीं.
महामारी के दौरान पाबंदियों के चलते एयर ट्रैवल की मांग इतनी कम थी कि ज्यादा विमानों की जरूरत ही नहीं रह गई थी. अब जबकि स्थितियां सुधर रही हैं तो कंपनियां उन्हें एकाएक वापस पटरी पर नहीं ला सकतीं. एक विमान की सर्विसिंग में 100 वर्क आवर और एक बड़ा अमाउंट खर्च होगा. ऐसे में कंपनियां बहुत सोच-समझ कर फैसला ले रही हैं.
पिछले साल समर सीजन में हवाई किराये में 15% की बढ़ोतरी देखी गई थी. रिपोर्ट में इस समर सीजन भी बढ़ोतरी का आंकड़ा 2 डिजिट में रह सकता है.
कोविड के कारण एयरलाइंस को करीब 200 बिलियन डॉलर (करीब 16 लाख करोड़ रुपये) का घाटा हुआ था और इस दौरान लाखों नौकरियां गईं. ट्रेंड स्टाफ के एक बड़े तबके ने करियर फील्ड ही चेंज कर लिया.
अब जबकि चेक-इन डेस्क, इमिग्रेशन काउंटर जैसी जगहों पर ट्रेंड कर्मियों की फिर से जरूरत पड़ रही है तो ट्रेंड स्टाफ की फिर से भर्ती करने के लिए कंपनियां संघर्ष कर रही है.
उन्हें आकर्षित करने के लिए मोटी सैलरी ऑफर करनी पड़ रही है. हवाई किराये में बढ़ोतरी के पीछे ये भी एक फैक्टर है.
एविएशन इंडस्ट्री की ऑपरेशनल कॉस्ट में फ्यूल प्राइस एक बड़ा फैक्टर है. ईंधन की कीमतों में कुछ कमी तो आई है, लेकिन जनवरी 2019 की तुलना में कच्चा तेल अभी भी 50% से ज्यादा महंगा है.
ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में एयरलाइंस की हिस्सेदारी 2% से ज्यादा है. भविष्य में इसे कम करने के लिए सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल की जरूरत होगी, लेकिन यह पारंपरिक जेट ईंधन से 5 गुना अधिक महंगा पड़ेगा.
इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के मुताबिक, एविएशन इंडस्ट्री को 2050 तक कार्बन न्यूट्रल बनने के लिए 2 ट्रिलियन डॉलर का भुगतान करना होगा. इससे निपटने के लिए एयरलाइंस की उड़ानें और भी महंगी हो जाएंगी और उन्हें टिकट की कीमतें भी बढ़ानी होंगी.