इस वक्त हरी आंखों वाली बिल्ली ‘मिली’ शायद मुंबई की किसी सड़क पर मछलियों की टोकरी के गिर्द गश्त लगा रही होगी या किसी दीवार से उचककर आसमान देख रही होगी. लेकिन अब से ठीक 3 महीने पहले कार से टकराकर बैकबोन और पांव टूटने के बाद मिली के पास जिंदगी की बहुत कम गुंजाइश बची थी.
दरअसल दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है फिर वो चाहे इंसानों की हो या जानवरों की. मुश्किल वक्त के दौरान मिली को मदद देने वाले मुंबई के NGO ‘Pawpulation Control’ की ट्रस्टी मीरा सिंह कहती हैं, "जानवरों के लिए मूवमेंट ही सबकुछ होता है, इंसानों के लिए व्हील-चेयर है, स्टिक है, रॉड है, जानवरों के लिए ये मुमकिन नहीं है. मेडिकल साइंस ने ऐसे एक्सपेरिमेंट तो किए है लेकिन इसमें ज्यादा कामयाबी नहीं मिली."
सपनों के शहर मुंबई में मिली शायद खुद भी खिली धूप में कोई सपना देख रही होगी जब ये गोल-गोल घूमती दुनिया उसकी आंख मींचने की तेजी से बदल रही है.
इन दिनों Persian, Ragdoll, Siamese से लेकर Bombay Cat तक अलग अलग ब्रीड्स की बिल्लियां हजार से लेकर लाख तक की कीमत में मौजूद हैं. अब ऐसी कई दुकानें और संस्थाएं हैं जो सिर्फ कैट्स पर फोकस करती हैं.
मीरा कहती है, "पिछले 10 साल से अगर हम तुलना करें तो पाएंगे कि बिल्लियों का बाजार हैरतअंगेज तौर पर बड़ा हुआ है. महाराष्ट्र सरकार द्वारा कुत्तों की आबादी कंट्रोल करने के प्रयास के नतीजे में यहां बिल्लियां गोद लेने के आंकड़ों में तेजी आई है. कोरोना के दौरान कैट एडॉप्शन में लगभग 40% से 50% बढ़ोतरी हुई. बिल्ली इंडिपेंडेंट भी होती है और उसे बाहर सैर कराने की जरूरत भी नहीं होती."
मुंबई के सांताक्रूज स्थित मीरा सिंह का ये NGO बिल्लियों के लिए घर, आश्रम और एडॉप्शन सेंटर के अलावा हॉस्पिटल भी है. सर्जरी के बारे में मीरा कहती हैं, "बिल्लियां लगभग हर ढाई महीने पर 4-5 बच्चे पैदा करती हैं. उनके लिए इतने सारे घर खोज पाना मुमकिन नहीं है. ऐसे भी लोग हैं जो सोसाइटी वॉचमैन को कह देते हैं कि बिल्लियों के बच्चों को मछली-बाजार के मुहाने पर फेंक आएं. हम कहते हैं कि हमारे पास लाएं हम सर्जरी करेंगे और अब तो मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है ये कोई रिस्की चीज नहीं रह गई है."
हर कोई घर लौटने की एक खूबसूरत वजह खोजता है या कोई इंतजार जो उसे अपनी चौखट तक बार-बार खींच लाए. इस बात से बहुत कम फर्क पड़ता है कि ये इंतजार कौन कर रहा है. 38 वर्ष की मीरा सिंह भी शादीशुदा नहीं हैं. उनके पास जिंदगी की एक खूबसूरत वजह है और कैट्स उनके लिये औलाद की तरह ही हैं.
बघीरा, बेला, बोका, बिल्ली और बर्फी नाम की कैट्स के पिता 45 साल के शैलेष ने जिंदगी में सिंगल रहना चुना है. वो मिशन कम्पैशन के साझा ट्रस्टी भी हैं. वो कहते हैं "हिंदुस्तान में कानून ऐसा है कि सिंगल इंसान के लिए बच्चा गोद लेना मुश्किल है जबकि बिल्ली गोद लेना आसान है. ये एक एडिक्शन की तरह भी है. पहले आप एक बिल्ली गोद लेते हैं फिर दूसरी, फिर तीसरी."
वहीं कैट पैरेंट स्टेफन कहते हैं कि, "बिल्लियां हूबहू बच्चे जैसी नहीं है लेकिन उनके पास भी वैसी ही मुहब्बत है. वो हमेशा देखती रहती हैं कि बॉक्स के अंदर क्या हैं."
कैट्स का बाजार बड़ा है लेकिन हर तरह की ब्रीड लीगल नहीं है. इसके अलावा भारत की आबोहवा उन्हें सूट नहीं करती जिससे उनमें बीमारियों का खतरा भी काफी बढ़ जाता है.
मीरा कहती हैं, "बिल्लियों का एक पूरा चोर बाजार भी है. अगर आप इंडियन ब्रीड लेते हैं तो ये आपके लिए बेहतर ही होगा क्योंकि उनमें इंफेक्शन की संभावना भी कम होती है और उन्हें रखना सस्टेनेबल भी है. NGO भी देसी बिल्लियों को 2500 रूपये तक में सर्जरी से लेकर वैक्सीनेशन तक सारी सर्विसेज देते हैं लेकिन अगर आपके पास कोई विदेशी ब्रीड है तो प्राइवेट क्लिनिक में आपको 10 से 20,000 तक भी खर्च करना पड़ सकता है."
बीमार बिल्लियों की देखभाल करने के लिए तैनात राजकुमार कहते हैं "बिल्लियों के साथ रहकर मैं सुधर गया हूं, अब मैं खुश रहता हूं और सब काम प्यार से करता हूं."
साइंस ने भी ये साबित कर दिया है कि जानवरों के साथ परवरिश पाने वाले बच्चे जहनी तौर पर मजबूत होते हैं. वयस्क भी उनके आस-पास रहकर खुश महसूस करते हैं. जब आप बेजुबानों का सहारा बनते हैं तो वो अनजाने ही आपका सहारा बन जाते हैं.