दक्षिण भारत (South India) के दो राज्य- कर्नाटक (Karnataka) और तमिलनाडु (TamilNadu) लेबर लॉ में बड़े बदलाव को लेकर चर्चा में हैं. कर्नाटक फरवरी में ही फैक्ट्रीज एक्ट में संशोधन कर चुका है. लेकिन तमिलनाडु में विरोध की आवाज तेज होने पर संशोधन को रोक दिया गया है.
सवाल है कि फैक्ट्री और लेबर से जुड़े कानूनों में क्या-क्या बड़े बदलाव हो रहे हैं? ये बदलाव क्यों हो रहे हैं और इनके विरोध की वजह क्या है? साथ ही इस कानून में संशोधनों का असर क्या होगा?
दरअसल, कर्नाटक विधानसभा ने उद्योगों के कामकाज में 'लचीलापन' लाने के लिए 1948 के कारखाना अधिनियम में संशोधन को पारित कर दिया. विधानसभा में 24 फरवरी को कुछ बदलावों को बिना किसी बहस के पास कर दिया गया, क्योंकि विपक्ष ने जोरदार विरोध करते हुए वॉकआउट किया था. पुराने कानून में संशोधन से कंपनियों को कुछ शर्तों के साथ कई तरह की छूट मिल जाती है. इनमें काम के घंटे बढ़ाने, ओवरटाइम बढ़ाने और महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की इजाजत देने जैसी चीजें शामिल हैं.
तमिलनाडु विधानसभा ने भी अप्रैल में इसी तरह के संशोधनों को पारित किया. हालांकि कुछ राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों के विरोध के बाद तमिलनाडु सरकार ने कानून को अमल में लाने से रोक दिया है.
जहां तक केंद्र का सवाल है, उसने लेबर लॉ में सुधार के लिए कदम उठाए हैं. केंद्र सरकार ने चार लेबर कोड पेश किए हैं. हालांकि, उसने राज्यों पर छोड़ दिया है कि वे अपनी विधायिका से बिल पास करके अपने मुताबिक कानून बना सकें.
कर्नाटक में फैक्ट्रीज एक्ट में संशोधन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. इस संशोधन से कई चीजें बदल जाएंगी. नए कानून के मुताबिक, कंपनियां चौबीसों घंटे उत्पादन के लिए 12-12 घंटे की दो शिफ्ट चला सकेंगी. कोई फर्म अपने कर्मचारियों की सहमति से एक शिफ्ट के दौरान 12 घंटे तक काम ले सकेगा. लेकिन उस स्थिति में साप्ताहिक छुट्टी 3 दिनों की होगी. पहले रोजाना 8 घंटे की शिफ्ट के हिसाब सप्ताह में 6 दिन काम करना था. यानी सप्ताह में काम के कुल घंटे 48 ही रहेंगे, इसमें कोई बदलाव नहीं होगा. अब तीन महीने की अवधि में ओवरटाइम 75 घंटे से बढ़ाकर 145 घंटे तक कर दिया गया है, जिसके लिए पैसे मिल सकेंगे. साथ ही महिलाओं को ओवरटाइम करने और नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति होगी. इससे जुड़े कानून को भी लचीला बनाया गया है.
दरअसल, कर्नाटक और तमिलनाडु, दोनों राज्य अपने यहां बड़े पैमाने पर निवेश के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां को लुभाना चाहते हैं. लेकिन पुराने कानून ऐसी कंपनियों को आकर्षित करने में मददगार नहीं थे. यही वजह है कि कानून में संशोधन की जरूरत पड़ रही है. दूसरी ओर, कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने जोखिम को कम करने के लिए 'चीन प्लस वन' की रणनीति अपना रही हैं. माने अपने प्रोडक्शन को चीन के अलावा दूसरे देशों में भी शिफ्ट करना चाह रही हैं. अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते तनाव ने कंपनियों को दूसरे ठिकाने तलाशने पर मजबूर कर दिया. ग्लोबल सप्लाई चेन से जुड़ी दिक्कतें भी हैं. ऐसे में भारत इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता. हालांकि भौगोलिक नजरिए से भारत को वियतनाम, इंडोनेशिया, बांग्लादेश जैसे देशों से चुनौती मिल रही है. संशोधन के बाद कर्नाटक का लेबर लॉ देश में सबसे लचीला बन गया है.
कानून में बदलाव के लिए कुछेक बड़ी कंपनियों के दबाव को भी बड़ी वजह माना जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम बनाने वाली नामी कंपनी फॉक्सकॉन (Foxconn) अब कर्नाटक में बड़ा निवेश करने जा रही है. फॉक्सकॉन वही कंपनी है, जो एपल (Apple) के लिए आईफोन सप्लाई करती है.
तमिलनाडु में सुधार भले ही अटका पड़ा है, लेकिन उसकी योजना स्पष्ट है. देश के ऑटोमोबाइल, परिधान और फुटवियर सेक्टर के निर्यात में तमिलनाडु की भागीदारी 37.6%, 30.8% और 46.4% है. तमिलनाडु इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को भी अपने यहां इस स्तर तक उठाना चाहता है.
बदले हुए कानून से निश्चित तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लुभाने में मदद मिलेगी. इससे इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री की सूरत बदलने की उम्मीद की जा रही है. कंपनियों का मानना है कि कम समय में ज्यादा उत्पादन से लागत में कमी आएगी. साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बिक्री भी बढ़ेगी. राज्य में निवेश बढ़ने पर स्वाभाविक रूप से नौकरियों के मौके तेजी से बढ़ेंगे. नाइट शिफ्ट में काम करने की इजाजत से प्रोडक्शन में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ेगी. अभी इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़े उत्पादन के मामले में चीन, ताइवान, वियतनाम जैसे देशों में महिलाओं का खासा दबदबा है. अब भारत में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ सकेगी.
सवाल है कि इन बदलावों का विरोध क्यों हो रहा है? ट्रेड यूनियनों का कहना है कि बिल के प्रावधानों में कई चीजें स्पष्ट नहीं की गई हैं, जिससे नियोक्ता इनका दुरुपयोग कर सकते हैं. इनका कहना है कि बदलाव से कंपनियों को अपनी मर्जी के मुताबिक काम कराने की आजादी मिलेगी, जबकि कर्मचारियों का शोषण बढ़ेगा. साथ ही इनकी मांग है कि अगर कानून में बदलाव उत्पादन बढ़ाने के लिए है, तो कंपनियों को चाहिए कि वे ज्यादा कर्मचारियों की नियुक्त करें, न कि काम के घंटे बढ़ाएं.
दूसरी ओर राज्य सरकार का तर्क है कि कोई भी कंपनी किसी भी बदलाव को अपने कर्मचारियों पर जबरन नहीं लाद सकेगी, क्योंकि आखिरी फैसला कर्मचारियों के हाथों में होगा. यहां राज्य का तर्क थोड़ा कमजोर नजर आ रहा है. व्यावहारिक तौर पर कर्मचारियों के पास अपने नियोक्ता के फैसले के खिलाफ जाने या किसी तरह की सौदेबाजी करने की ताकत नहीं होती.
एक और बड़ी चिंता किसी इंसान के काम करने की क्षमता और सेहत से जुड़ी है. कई एक्सपर्ट का मानना है कि कोई व्यक्ति अगर लगातार 12 घंटे तक मेहनत का काम करता है, तो इससे न केवल उसकी सेहत पर बुरा असर पड़ेगा, बल्कि उसके काम का स्तर भी गिरेगा. अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (ILO) के मानक भी काम की अवधि रोजाना 8 घंटे और सप्ताह में कुल 48 घंटे तक रखने का सुझाव देते हैं.
कुल मिलाकर, सरकारों के लिए यह कड़े इम्तिहान का वक्त है. विकास की रेस में उन्हें कर्मचारियों की चिंताओं और अपेक्षाओं का ध्यान तो रखना ही चाहिए. साथ ही यह भी देखना चाहिए कि नए निवेशकों को लुभाकर रोजगार पैदा करने के मौके हाथ से निकल न जाएं.