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बैंकों को 'सुप्रीम' झटका, SC ने कहा-कर्जदार को सुने बिना खाता 'फ्रॉड' घोषित नहीं कर सकते बैंक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक लोन लेने वालों का पक्ष सुना न जाए, तब तक उनके खातों को फ्रॉड घोषित नहीं किया जाएगा. खातों को फ्रॉड कैटेगरी में डालने से गंभीर सिविल परिणाम होते हैं.
NDTV Profit हिंदीNDTV Profit डेस्क
NDTV Profit हिंदी01:27 PM IST, 27 Mar 2023NDTV Profit हिंदी
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बैंक अब किसी कर्जदार के खाते को इतनी आसानी से 'फ्रॉड' घोषित नहीं कर सकेंगे. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान एक अहम फैसले में कहा है कि जब तक कर्जदारों का पक्ष सुन न लिया जाए, तबतक उनके खातों को फ्रॉड घोषित नहीं किया जाए. ये फैसला SBI की याचिका पर आया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी अकाउंट को फ्रॉड की कैटेगरी में डालने का मतलब, कर्जदार को कर्ज लेने के लिए अयोग्य होने की वजह से ब्लैकलिस्ट करने के बराबर है. जिसके नागरिक और दंडात्मक दोनों नतीजे होते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसलिए, किसी अकाउंट को फ्रॉड घोषित करने के से पहले एक सुनवाई का मौका तो जरूर दिया जाना चाहिए.

तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर

लोन मामले को लेकर मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने दिसंबर 2020 में तेलंगाना हाईकोर्ट की ओर से दिए गए फैसले को बरकरार रखा है.

क्या है मामला

दरअसल, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने तेलंगाना हाई कोर्ट के 2020 में एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी थी. तेलंगाना हाईकोर्ट ने साल 2020 में फैसला दिया था कि किसी भी अकाउंट को 'फ्रॉड' है या नहीं, घोषित करने से पहले सुनवाई का एक मौका दिया जाना चाहिए. वो चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, किसी पार्टी को धोखाधड़ी वाले खाताधारक के रूप में घोषित करने से पहले इसे लागू किया जाना चाहिए. 

फ्रॉड कैटगरी में डालने से गंभीर परिणाम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना सुनवाई का अवसर दिए लोन लेने वालों के खातों को फ्रॉड कैटगरी में डालने से गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि किसी अकाउंट को फ्रॉड की कैटेगरी में डालने से पहले बैंकों को एक तर्कपूर्ण आदेश पास करना चाहिए, ताकि किसी भी मनमाने फैसले से बचा जा सके.

कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय यही मांग करता है कि कर्जदार को नोटिस दिया जाना चाहिए और बैंकों ने जो नतीजा निकाला है, उसका जवाब देने का मौका मिलना चाहिए. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ किया कि सुनवाई का अधिकार FIR दर्ज करने से पहले कर्जदार को नहीं मिलेगा

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