हम सोचते हैं कि फूलों से अपना घर सजा लें मगर फूलवालों की कोशिश बस इतनी है कि फूलों से किसी तरह अपनी जिंदगी चला लें. 20 रुपये का मोगरे का एक गजरा है और 50 के सेवंती के तीन फूल, शोख लाल गुलाब और चटख पीला कनेर भी है. मुंबई के दादर फूल बाजार में आप क्या खरीदेंगे?
ये दादर फूल बाजार बसता तो ‘फूल-गली’ में है लेकिन अगर कारोबार की सब कड़ियों को जोड़ा जाए तो खेती, छोटी-बड़ी दुकानों और फुटकर विक्रेताओं को मिलाकर इसका फैलाव पुणे, वर्सोई, सांगली, अंबरनाथ, कोल्हापुर, नासिक, अलीबाग, ठाणे, कल्याण, पनवेल और औरंगाबाद समेत पूरे महाराष्ट्र में है. इस ‘गुलशन के कारोबार’ में लोगों की चुनौतियां कठोर हैं और कलेजा मजबूत, इसलिए ही इसकी खुशबू पूरे देश में महकती है.
नीली साड़ी में गुलाब बेचती लगभग 50 साल की सिंधुबाई कांबले को पता भी नहीं कि उन्होंने कितनी बड़ी लड़ाई का बीड़ा उठाया है. वो ‘वुमन ऑफ द हाउस’ हैं, एक यकीन से लबरेज हाउस हसबैंड की पत्नी जबकि उनके पास घर नहीं है. वो 4 बजे भोर से फुटपाथ पर फूलवालों की पंगत में बैठ जाती हैं. "पति बाकी कामों में मदद करते हैं, पानी लाते हैं, गाड़ी से सामान उतारते हैं, पहले बच्चों को स्कूल भी छोड़ते थे लेकिन अभी बच्चे बड़े हो गए हैं. मैं दुकान देखती हूं, बाकी वो संभाल लेते हैं."
चटख हरी चूड़ियों की खनक में फूलों की गमक के साथ 60 साल की सुरेखा ने भी समाज की घिसी-पिटी मान्यताओं को एक सिरे से नकार दिया है. पति को खोने के बाद न सिर्फ उन्होंने अपने काम को जारी रखा है बल्कि लिबास में रंगों को भी संभाल रखा है. वो कहती हैं, "पति गुजर गए, अब मैं ही सब काम देखती हूं, कोई बच्चा गजरा बुनता है, कोई सड़क पर पड़े फूल चुनता है ताकि उन्हें गूंथकर बेचा जा सके."
सिंधुबाई कांबले और सुरेखा ने फूलों के बाजार में दुनिया से लोहा ले रखा है. सुरेखा बीते 20 साल से फुटपाथ पर रहती हैं, "मेरा कोई घर नहीं है. रात को सब दुकान बंद होने के बाद किसी भी दुकान के सामने कागज बिछाकर सो जाती हूं. जब गाड़ी आती है तो सब टूट जाता है. हम फिर कागज लाते हैं, फिर प्लास्टिक लाते हैं और ठीक कर लेते हैं."
फूलों में सबसे ज्यादा मांग मोगरे की है. इस समय बाजार में इसका दाम 1000 रूपए किलो है. एक किलो की बिक्री पर 300 से 400 रूपए तक मुनाफा आराम से हो जाता है. दादर फूल बाजार व्यापारी संघ के प्रमुख पांडुरंगा आमले बताते हैं, "पहले मजदूर 2 रुपये में जो काम करते थे, वहां अब 20 रुपये देना होता है. हम चाहते हैं कि यहां कुली हो, फूलों को लोड करने के लिए पार्किंग एरिया हो. बारिश में भी बाजार का हाल बुरा होता है."
कोरोना के दौर में फूलवालों ने जो कर्ज लिया था वो अभी तक नहीं उतरा है. सुरेखा के 6 लोगों के परिवार में सभी सदस्यों ने मिलकर लगभग दो लाख का कर्ज लिया था, जिसे वो अभी भी चुका रहे हैं. वहीं सिंधुबाई कांबले कहती हैं, "अगर कभी बिक्री नहीं होती तो फूल फेंकने भी पड़ते हैं, ऐसे में कभी 200 रुपये का नुकसान होता है और कभी 300 का. मैंने कोरोना में 20-30 हजार कर्ज लिया था. 10 हजार चुका दिया है, बाकी थोड़ा-थोड़ा करके पूरा करेंगे."
केंद्र सरकार ‘स्ट्रीट वेंडर्स’ को काम फिर से शुरू करने में मदद के लिए आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत ‘पीएम स्वनिधि योजना’ भी चला रही है, जिसमें वो 10,000 रुपये तक का लोन ले सकते हैं.
सिंधुबाई कांबले की बहन शांता कहती हैं, "सरकार की मदद बाद में शुरू हुई है. जब हमने कर्ज लिया था तब ये योजना नहीं चल रही थी."
फूल बाजार की औरतों का मानना है कि आजकल के बच्चे इस काम में नहीं आना चाहते हैं. हालांकि नए ट्रेंड फॉलो करने में फूल बाजार भी किसी दूसरे सेक्टर से पीछे नहीं है. अब ये बिजनेस फुटपाथ और दुकानों के अलावा धीरे-धीरे ऑनलाइन स्पेस में भी पांव पसार रहा है.
फूल बाजार के स्कोप पर बात करते हुए पांडुरंगा आमले ने कहा, "समय बदलता रहता है, पर ये तो तय है कि जब तक भगवान रहेंगे, मन में यकीन रहेगा तब तक फूल बाजार भी रहेगा."
इस बाजार में भीड़ कम हो या ज्यादा, खुशबू कम नहीं होगी. नई पीढ़ी इस कारोबार से कितनी ही दूरी बरते लेकिन गजरा पहनने की ख्वाहिश हमेशा बरकरार रहेगी.
तो अगर आप फूल बाजार तक आ रहे हैं तो क्या खरीदेंगे? खुशबू नहीं तो शायद कोई कहानी रोक ले या फिर बदलाव की वो बयार जो यहां की औरतों की रगों में बह रही है.