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स्वीप-इन FD या लिक्विड फंड: इमरजेंसी के लिए कहां करें निवेश?

इमरजेंसी फंड को एक रिजर्व फंड मानना चाहिए, जो आपके रेगुलर खर्च के लिए नहीं, बल्कि संकट के समय काम आने के लिए रखा जाता है.
NDTV Profit हिंदीNDTV Profit डेस्क
NDTV Profit हिंदी12:19 PM IST, 16 Nov 2023NDTV Profit हिंदी
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फाइनेंशियल प्लानिंग (Financial Planning) करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अपना पूरा फंड किसी एक ही स्‍कीम में लॉक न हो. मुश्किल वक्त में काम आने वाले इमरजेंसी फंड को अपनी प्लानिंग में जगह देना बेहद जरूरी है. अचानक कोई आर्थिक परेशानी खड़ी हो जाए, तो यह इमरजेंसी फंड ही आपकी टेंशन दूर कर सकता है.

इमरजेंसी फंड को एक रिजर्व फंड मानना चाहिए, जो आपके रेगुलर खर्च के लिए नहीं, बल्कि संकट के समय काम आने के लिए रखा जाता है. इमरजेंसी फंड के लिए दो बेहतर और आकर्षक विकल्प हैं - लिक्विड फंड (Liquid Fund) और स्वीप-इन FD (Sweep-in FD). लिहाजा, इमरजेंसी फंड की प्लानिंग करने के लिए इन दोनों योजनाओं के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए. 

दोनों स्‍कीम में सेविंग्‍स अकाउंट से ज्यादा फायदा

बहुत से लोग इमरजेंसी फंड के तौर पर जमा की गई रकम को बैंक के बचत खाते में रखना बेहतर समझते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है, जब चाहे पैसे निकालने के लिए बचत खाता सबसे बेहतर विकल्प है.

लेकिन यहां एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि बचत खाते में जमा रकम पर मिलने वाला ब्याज बेहद कम होता है. ज्यादातर बैंकों में इस पर 3 से 3.5% के बीच ही ब्याज मिलता है, जबकि स्वीप-इन FD और लिक्विड फंड में बचत खाते की तुलना में काफी बेहतर, यहां तक कि दोगुना ब्याज भी मिल सकता है और जरूरत पर इनमें जमा पैसे भी बचत खाते की तरह ही आसानी से निकाले जा सकते हैं.

लिक्विड फंड  क्या हैं 

लिक्विड फंड भी एक तरह के डेट फंड हैं जो ट्रेजरी बिल, कमर्शियल पेपर, हाई-रेटेड कॉर्पोरेट और सरकारी बॉन्ड जैसे शॉर्ट टर्म मैच्‍योरिटी वाले मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट में निवेश करते हैं. इन विकल्पों में स्‍टेबल रिटर्न मिलता है. लिक्विड फंड जिन विकल्‍पों में निवेश करते हैं, उनकी मैच्‍योरिटी 91 दिनों से ज्यादा नहीं होती है.

लिक्विड फंड का मुख्य उद्देश्य निवेशकों को हाई लेवल की लिक्विडिटी यानी तरलता और उनके कैपिटल की सुरक्षा प्रदान करना है. इस वजह से फंड मैनेजर हाई रेट वाले डेट विकल्‍पों में निवेश करता है, जो सिर्फ 91 दिनों में मैच्‍योर होते हैं. फंड मैनेजर यह देखते हैं कि पोर्टफोलियो की एवरेज मैच्योरिटी 3 महीने हो. इससे ब्याज दर में उतार-चढ़ाव के प्रति फंड के रिटर्न की सेंसिटिविटी कम हो जाती है और लिक्विड फंड में रिस्क कम हो जाता है. लिक्विड फंड में बैंकों के बचत खाते की तरह लिक्विडिटी भी मिलती है. इन फंडों में लॉक-इन अवधि नहीं होती है.

किसे करना चाहिए निवेश

लिक्विड फंड अन्य म्यूचुअल फंडों की तुलना में अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं, क्योंकि इनकी मैच्‍योरिटी भी शॉर्ट टर्म होती है. वहीं फंड वैल्यू में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता है. अंडरलाइंग सिक्‍योरिटीज की मैच्‍योरिटी पोर्टफोलियो की मैच्योरिटी से मेल खाती है.

ऐसे निवेशक जो जोखिम लेने से बचते हैं और अपने सरप्‍लस फंड या कहीं से अचानक मिलने वाली रकम को शॉर्ट टर्म के लिए निवेश करना चाहते हैं, उनके लिए विकल्प बेहतर है. परफॉर्मेंस-बेस्‍ड इंसेंटिव, बोनस या कैपिटल एसेट बेचकर मिलने वाली रकम का इस्तेमाल इस फंड में निवेश करने के लिए कर सकते हैं.

कैसे चुनें सही फंड

लिक्विड फंडों में पिछले 1 साल का रिटर्न देखें तो यह औसतन 6 से 7% सालाना है. अच्छा प्रदर्शन करने वाले लिक्विड फंड अपने बेंचमार्क के साथ-साथ अपने पीयर्स से बेहतर रिटर्न देते हैं. लेकिन निवेशकों को अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह के आधार पर उन्‍हीं फंड में निवेश करना चाहिए, जो लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. साथ उनका एक्‍सपेंस रेशियो भी कम होना चाहिए.

आदित्य बिरला सन लाइफ लिक्विड फंड, Axis लिक्विड फंड, UTI लिक्विड फंड, ICICI प्रू लिक्विड फंड और L&T लिक्विड फंड जैसे डेट फंडों ने बीते 1 साल में 7% सालाना से ज्यादा रिटर्न दिया है.

Sweep-in FD: क्या है स्वीप-इन-FD

ट्रेडिशनल FD में भी बचते खाते की तुलना में करीब डबल रिटर्न मिलता है. लेकिन यहां दिक्‍कत लिक्विडिटी की होती है. ट्रेडिशनल फिक्स्ड डिपॉजिट में बचत खाते की तरह लिक्विडिटी नहीं होती. इसमें पैसा तय समय के लिए लॉक हो जाता है. लेकिन स्वीप-इन FD में ऐसी दिक्कत नहीं होती.

FD के साथ स्वीप-इन सुविधा के तहत निवेशक को बैंक खाते में पड़ी अतिरिक्त धनराशि को FD अकाउंट में ट्रांसफर करने की छूट मिल जाती है. स्वीप-इन-FD एक ऑटो-स्वीप सर्विस होती है. इसके तहत आपके सेविंग्स अकाउंट में जो भी एक्स्ट्रा पैसे होते हैं, उन्हें FD में ट्रांसफर कर दिया जाता है.

इसके लिए आपको पहले एक थ्रेशहोल्ड लिमिट तय करनी होती है. इस लिमिट से ज्यादा रकम एक्स्ट्रा फंड मानकर FD में डाल दी जाती है. स्वीप-इन के लिए यह थ्रेशहोल्ड लिमिट तय करने का काम आम तौर पर बैंक करते हैं, लेकिन कई बैंक अकाउंट होल्डर को जरूरत के हिसाब से इसे कस्टमाइज करने का विकल्प भी देते हैं. इस तरह आपको एक्‍स्‍ट्रा रकम पर FD वाला ब्याज मिलने लगेगा. सेविंग अकाउंट से लिंक FD 1 से 5 साल तक की होती है.

कम से कम कितना निवेश

बैंक आम तौर पर बचत खाते से स्वीप-इन एफडी में 1 हजार रुपये के मल्टीपल में रकम ट्रांसफर करते हैं. कुछ बैंक निवेशकों के निर्देश के अनुसार 1 रुपये से 1000 रुपये की रेंज में ट्रांसफर की भी अनुमति देते हैं.

ब्याज दर

स्वीप-इन FD खाते के लिए ब्याज दर किसी भी सामान्य FD के समान ही होती है. निवेश की अवधि पर भी निर्भर करता है. जैसे FD में अलग-अलग अवधि के लिए अलग-अलग ब्याज दरें तय होती हैं.

पैसे निकालने का नियम

आम तौर पर स्वीप-इन FD से मैच्योरिटी से पहले पैसे निकालते समय लास्ट इन फर्स्ट आउट (LIFO) मेथड का उपयोग किया जाता है. इसका मतलब है कि अगर आपके बैंक बचत खाते में बैलेंस चेक या SIP के भुगतान के लिए धनराशि कम पड़ गई, तो LIFO मेथड का उपयोग करके स्वीप-इन FD से रकम निकाल ली जाती है. यानी स्वीप-इन FD आपको आकर्षक ब्याज दर के साथ हाई लेवल की लिक्विडिटी भी प्रदान करता है. 

अगर आप अक्सर स्वीप-इन FD से पैसे निकालते हैं, तो निकाली गई रकम पर उतना ही ब्याज मिलेगा, जितने दिन तक FD में रही है. स्वीप-इन सुविधा के माध्यम से FD में निवेश की गई अतिरिक्त राशि को पूरी एफडी तोड़े बिना निकाला जा सकता है. साथ ही, बैंक FD से पैसे निकालने पर कोई जुर्माना भी नहीं लगता है.

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