CBI ने मुंबई में GTL इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के दफ्तर में तलाशी अभियान चलाया है. PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के कथित लोन धोखाधड़ी मामले में GTL इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और बैंकों के अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के बाद केंद्रीय एजेंसी ने ये तलाशी ली है.
13 बैंकों के अधिकारी एजेंसी की निगरानी में हैं. उन पर कोलेटरल सिक्योरिटीज से लोन हासिल करने की कोशिश के बिना कंपनी के 3,224 करोड़ रुपये के बकाये को एक एसेट रिकंस्ट्रक्शन फर्म को 1,867 करोड़ रुपये में देने का आरोप है.
अधिकारियों ने कहा कि ये बैंक GTL के बकाया लोन से संबंधित बातचीत का हिस्सा थे. इनमें यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, ICICI बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, आंध्रा बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, एक्सिस बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया और देना बैंक शामिल हैं.
FIR के मुताबिक, CBI ने प्रारंभिक पूछताछ के बाद मामला दर्ज किया. शुरुआती जांच में सामने आया कि मनोज तिरोडकर द्वारा प्रमोट की गई GTIL, पैसिव टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर साइट्स के कारोबार में शामिल थी, जो कई सर्विस प्रोवाइडर्स को होस्ट करने की क्षमता रखते थे.
अधिकारियों ने कहा कि हाल ही में कंपनी के नवी मुंबई के दफ्तर में तलाशी ली गई थी. कंपनी के पास 19 बैंकों के कंसोर्टियम का 11,263 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है. 2011 में, उसने क्रेडिट सुविधाओं पर ब्याज और किस्तों का भुगतान करने में अक्षमता जाहिर की थी. FIR में कहा गया है कि बैंकों ने कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग का रास्ता लिया, जो फेल हो गया.
कर्जदाता बैंकों ने 2016 में स्ट्रैटजिक डेट रिस्ट्रक्चरिंग का रास्ता चुना, जिसमें 11,263 करोड़ रुपये के कुल लोन में से 7,200 करोड़ रुपये के कर्ज को इक्विटी शेयरों में बदल दिया गया, जिससे बकाया राशि 4,063 करोड़ रुपये बची, जिसे GTIL को कंसोर्टियम को भुगतान करना था.
पूछताछ में पाया गया है कि बड़े स्तर पर फंड्स का डायवर्जन किया गया. अधिकारियों ने आगे कहा कि लोन फंड्स को अलग-अलग वेंडर्स के जरिए लिया गया था, जो संबंधित पार्टियां थीं और जिनके डायरेक्टर्स, GTIL के डायरेक्टर्स भी थे.